गुरु सत्संग में शास्त्रीय संगीत के स्वरों से मन के तार झंकृत हो जाते हैं. प्राचीन वैदिक मन्त्रों से चेतना खिल उठती है. और उनके बीच के गहरे मौन में अनंत की अनुभूति प्राप्त होती है. हमारी चेतना में निहित इस मौन की गूँज को ही अंतर्नाद कहते हैं. यह केवल स्वर और ध्वनि का स्रोत ही नहीं बल्कि समस्त सृष्टि का आधार है. इसी के स्पंदन से जगत की रचना हुई.
मैं अगर भजन गाता हूँ तो केवल इस प्राप्ति को सामान्य रूप से बांटने के लिए. यह मुझपर गुरूजी की विशेष कृपा रही है और हर क्षण मैं स्वयं को इसके लिए कृतज्ञ महसूस करता हूँ और गदगद हो जाता हूँ!
जय गुरुदेव
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